ओबीसी एक्ट लागू करने की भी मांग, प्रदेश अध्यक्ष मनोज यादव के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने किया प्रदर्शन
लखनऊ उत्तर प्रदेश/ Etv News 24/संवाददाता वागीश
जातीय जनगणना में ओबीसी के लिए अलग कॉलम जोड़ने और पिछड़े वर्ग के उत्पीड़न की रोकथाम के लिए ओबीसी एक्ट लागू करने की मांग को लेकर कांग्रेस ने सोमवार को राजभवन का घेराव किया। ओबीसी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मनोज यादव के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता प्रदर्शन में शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र और प्रदेश सरकार से पिछड़े वर्ग की आबादी के अनुरूप राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की।
कांग्रेस नेताओं ने कहा कि जातीय जनगणना के आंकड़े सामने आने से ओबीसी की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति स्पष्ट होगी। इसके आधार पर आरक्षण, सरकारी नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में हिस्सेदारी तय की जा सकेगी। पार्टी ने पिछड़े वर्ग के उत्पीड़न के मामलों में प्रभावी कानूनी संरक्षण के लिए ओबीसी एक्ट की जरूरत भी बताई।
प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेताओं ने कहा कि ओबीसी की आबादी बड़ी होने के बावजूद सत्ता और संस्थानों में उनकी भागीदारी उस अनुपात में नहीं है। जातीय जनगणना में ओबीसी के लिए अलग से आंकड़े दर्ज करने को सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया।
2027 के लिए ओबीसी पर कांग्रेस का नया दांव
राजभवन घेराव को कांग्रेस की 2027 की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओबीसी को करीब 43-44 प्रतिशत आबादी वाला बड़ा सामाजिक वर्ग माना जाता है। हालांकि यह अनुमान पुराना है और जातीय समूहों की मौजूदा आबादी का सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में कांग्रेस जातीय जनगणना को आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व, आरक्षण और राजनीतिक हिस्सेदारी के मुद्दे से जोड़कर ओबीसी के बीच अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
सपा पहले ही PDA फार्मूले के जरिये पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समूहों को एकजुट करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। वहीं भाजपा का मजबूत सामाजिक आधार गैर-यादव ओबीसी समूहों में रहा है। ऐसे में कांग्रेस की सक्रियता को इन दोनों सामाजिक समीकरणों के बीच अपना अलग राजनीतिक स्पेस बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
कुर्मी-मौर्य-निषाद-राजभर पर भी नजर ओबीसी राजनीति अब केवल यादव बनाम गैर-यादव के समीकरण तक सीमित नहीं है।
कुर्मी,मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी, लोधी, निषाद, राजभर, पाल-बघेल समेत विभिन्न पिछड़े समुदायों का कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रभाव है। इन समूहों का राजनीतिक रुझान क्षेत्र और चुनाव के अनुसार बदलता रहा है।
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं के बीच भी राजनीतिक बदलाव के संकेत मिले हैं। यही कारण है कि 2027 से पहले सभी प्रमुख दल ओबीसी प्रतिनिधित्व और सामाजिक समीकरणों को लेकर अपनी रणनीति मजबूत कर रहे हैं।
सुलतानपुर-अवध में जातीय समीकरण होंगे अहम
सुलतानपुर और आसपास के अवध क्षेत्र में भी 2027 का चुनावी गणित सिर्फ यादव और गैर-यादव के बीच नहीं रहने वाला है। कुर्मी, मौर्य-कुशवाहा, निषाद-मल्लाह, पाल-बघेल, राजभर और अन्य पिछड़ी जातियों की स्थानीय संख्या और प्रभाव अलग-अलग सीटों पर परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। उम्मीदवार की जातीय स्वीकार्यता, पार्टी संगठन, स्थानीय मुद्दे और गठबंधन भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
ऐसे में राजभवन घेराव को कांग्रेस के संगठनात्मक प्रदर्शन के साथ-साथ ओबीसी के बीच अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि आंदोलन के आधार पर किसी खास ओबीसी समूह के कांग्रेस के पक्ष में जाने का निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी। 2027 में जातीय जनगणना, प्रतिनिधित्व, आरक्षण, स्थानीय उम्मीदवार और गठबंधन—इन सभी का संयुक्त प्रभाव ओबीसी मतदाताओं के रुख को तय कर सकता है।




