द सेकेंड ऑर्बिट’ का लोकार्पण, राकेश शर्मा ने वीडियो संदेश से दी शुभकामनाएं
अंतरिक्ष से न देश दिखता है, न सीमा, केवल एक पृथ्वी नजर आती है : शुभांशु शुक्ला
उत्तर प्रदेश/Etv News 24/संवाददाता वागीश कुमार
राजधानी लखनऊ के गोमती पुस्तक महोत्सव में मंगलवार को धरती से अंतरिक्ष तक पहुंचने की रोमांचक यात्रा की कहानी गूंजी। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत की ओर से आयोजित विशेष संवाद सत्र ‘धरती से अंतरिक्ष तक सपनों की उड़ान’ में ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से अपने जीवन, भारतीय वायुसेना में सेवा, प्रशिक्षण और अंतरिक्ष यात्रा के अनुभव साझा किए। इस अवसर पर उनकी अंग्रेजी पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का परिजनों के साथ संयुक्त रूप से लोकार्पण किया गया। भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने वीडियो संदेश के माध्यम से शुभांशु शुक्ला की उपलब्धि और पुस्तक की सराहना करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं।संवाद के दौरान शुभांशु शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने के बाद इंसान की सोच और नजरिया बदल जाता है। वहां न कोई देश दिखाई देता है, न शहर और न ही क्षेत्रीय सीमा। केवल एक सुंदर और एकीकृत पृथ्वी नजर आती है।
उन्होंने विद्यार्थियों को उदाहरण देते हुए कहा कि यदि अंतरिक्ष में कोई एलियन उनसे पूछे कि वे कहां से आए हैं और वे शहर या देश का नाम बताएं तो शायद वह न समझ पाए, लेकिन यदि कहें कि वे पृथ्वी से आए हैं, तो बात तुरंत समझ में आ जाएगी। अंतरिक्ष से देखने पर धरती पर खींची गई सीमाएं बेहद छोटी लगती हैं और यह एहसास होता है कि पूरी मानवता एक ही ग्रह की निवासी है।लांच के समय उत्साह के साथ डर भी थाशुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष यात्रा के शुरुआती पलों को याद करते हुए कहा कि पहली बार अंतरिक्ष की ओर रवाना होते समय उत्साह के साथ एक तरह का डर भी था। उन्होंने इसकी तुलना परीक्षा कक्ष से की। कहा कि परीक्षा शुरू होने से पहले सब कुछ जानते हुए भी कुछ क्षण के लिए दिमाग खाली-सा हो जाता है। कुछ ऐसा ही अनुभव उन्हें भी हुआ, लेकिन उन्होंने खुद को संभाला और मानसिक रूप से मजबूत होकर मिशन की ओर बढ़े।उन्होंने बताया कि सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण के कारण अंतरिक्ष में शरीर और दैनिक जीवन पूरी तरह बदल जाता है।
शरीर की लंबाई कुछ बढ़ सकती है और पृथ्वी पर लौटने के बाद वह धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में आती है। वहां उठना-बैठना और चलना भी पृथ्वी से अलग होता है। पानी गिराने पर वह नीचे नहीं जाता, बल्कि छोटी-छोटी गोल बूंदों के रूप में तैरता रहता है। इन्हीं परिस्थितियों का उपयोग वैज्ञानिक प्रयोगों में किया जाता है।उन्होंने बताया कि मिशन के दौरान सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण के मानव शरीर और वातावरण पर प्रभाव को समझने के लिए कई प्रयोग किए गए। लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने से मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं, इसलिए अंतरिक्ष यात्रियों को नियमित व्यायाम करना पड़ता है। पृथ्वी पर वापसी के बाद शरीर को दोबारा गुरुत्वाकर्षण के अनुरूप ढलने में भी समय लगता है।लखनऊ का युवा भी बन सकता है अंतरिक्ष यात्रीशुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को लगातार नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है।
देश गगनयान मिशन की तैयारी कर रहा है और भविष्य में चंद्रमा पर भारतीय मानव मिशन की दिशा में आगे बढ़ने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि यह सपना केवल वैज्ञानिकों या अंतरिक्ष यात्रियों का नहीं, बल्कि पूरे देश का है।उन्होंने लखनऊ के युवाओं से कहा कि इसी शहर का कोई युवा भविष्य में अंतरिक्ष यात्री बन सकता है। इसके लिए निरंतर मेहनत, अनुशासन, समर्पण और मानसिक मजबूती जरूरी है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत का संकल्प तभी पूरा होगा, जब देश का प्रत्येक युवा अपनी जिम्मेदारी समझकर अपने क्षेत्र में ईमानदारी से योगदान देगा।राकेश शर्मा के चर्चित संदेश ‘सारे जहां से अच्छा’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज नई पीढ़ी के सामने भारत को अंतरिक्ष से दुनिया के सामने नई दृष्टि से प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी है। अंतरिक्ष से पृथ्वी की सुंदरता, शहरों की रोशनी और हिमालय दिखाई देता है, लेकिन सीमाएं नजर नहीं आतीं। यह दृश्य याद दिलाता है कि पूरी दुनिया एक साझा ग्रह का हिस्सा है।
2019 में मिला था अंतरिक्ष यात्रा का संदेशअपने जीवन के संघर्ष और सफलता की कहानी बताते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा कि उनके विद्यालय के दिनों का लखनऊ आज के लखनऊ से काफी अलग था। उस समय सुविधाएं सीमित थीं और बिजली भी अक्सर चली जाती थी। ऐसे माहौल में अंतरिक्ष तक पहुंचने का सपना देखना आसान नहीं था। उन्होंने भी कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह अंतरिक्ष की यात्रा करेंगे, लेकिन बड़े सपने और निरंतर मेहनत ने असंभव लगने वाले लक्ष्य को संभव बना दिया।उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 उनके जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था। उस समय बेंगलुरु में रहते हुए उन्हें अपने चयन का संदेश मिला। संदेश मिलने के बाद वह कुछ देर अपनी गाड़ी के पास खड़े रहे और उस खुशी को महसूस करते रहे। सबसे पहले उन्होंने यह खबर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ साझा की। उन्होंने कहा कि परिवार की खुशी ने महसूस कराया कि यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की है।
भारतीय वायुसेना में सेवा के दौरान मिले अनुभवों को याद करते हुए उन्होंने पत्नी कामना के योगदान को भी विशेष रूप से रेखांकित किया। कहा कि हर चुनौतीपूर्ण दौर में परिवार का सहयोग और विश्वास उनकी ताकत बना। सफलता के पीछे परिवार, मित्रों, शिक्षकों और सहयोगियों की भूमिका को कभी नहीं भूलना चाहिए।अंत में उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में कोई भी सपना असंभव नहीं है। लक्ष्य बड़ा हो, मेहनत ईमानदार हो और प्रयास लगातार जारी रहना चाहिए। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे बड़े सपने देखें और भारत के विकास में अपनी भूमिका निभाएं। “बड़ा सपना देखने से मत डरिए। कई बार जो सपना असंभव लगता है, वही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है।”




