गड्ढे, जाम और बदहाल व्यवस्थाओं पर सियासत गरमाई, 2027 से पहले ‘जमीन पर काम’ बना राजनीतिक कसौटी
नगर निगम ने सड़क-पैचवर्क का बजट बढ़ाया, अब जनता पूछ रही—फाइलों से बाहर कब दिखेगा काम
लखनऊ उत्तर प्रदेश/ Etv News 24/संवाददाता वागीश
सरकारी अधिकारियों को वेतन, वाहन और ईंधन समेत तमाम सुविधाएं इसलिए उपलब्ध कराई जाती हैं कि सरकारी योजनाओं और नागरिक सेवाओं का असर जमीन पर दिखाई दे। लेकिन राजधानी में सड़क, यातायात, जल निकासी और सफाई जैसी समस्याओं को लेकर समय-समय पर उठने वाली शिकायतों ने सरकारी मशीनरी की जवाबदेही को राजनीतिक बहस का विषय बना दिया है।
लखनऊ राजधानी में सड़कें और गड्ढे अब केवल नगर निकाय की समस्या नहीं रह गए हैं। 2027 विधानसभा चुनाव से कुछ ही महीने पहले स्थानीय सुविधाओं का सवाल सीधे शासन और जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली से जोड़ा जा रहा है। विपक्ष के लिए सड़क, जाम, जलभराव और सरकारी कार्यालयों में सुनवाई जैसे मुद्दे सरकार को घेरने का माध्यम बन रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष के सामने इन शिकायतों का समयबद्ध समाधान दिखाने की चुनौती है।
दिलचस्प यह है कि लखनऊ नगर निगम ने मौजूदा वित्तीय वर्ष में सड़क मरम्मत और निर्माण का प्रस्तावित बजट 271 करोड़ से बढ़ाकर 326 करोड़ रुपये किया है। गड्ढे भरने के लिए अलग से प्रस्तावित राशि भी 10 करोड़ से बढ़ाकर 30 करोड़ रुपये की गई है। यानी संसाधन बढ़ाने की कोशिश दिखाई दे रही है, अब असली सवाल काम की गति और गुणवत्ता का है।
सड़क से निकलेगा 2027 का सवाल
राजधानी की राजनीति में इस समय संगठन से लेकर बूथ स्तर तक 2027 की तैयारियां तेज हैं। भाजपा ने हाल में विभिन्न मोर्चों में बदलाव कर जमीनी संगठन मजबूत करने पर जोर दिया है, वहीं विपक्ष स्थानीय समस्याओं और प्रशासनिक जवाबदेही को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है।
ऐसे माहौल में अगर किसी इलाके में महीनों सड़क खराब रहती है, जलभराव बना रहता है या यातायात व्यवस्था बार-बार चरमराती है तो जनता का सवाल सीधे स्थानीय जनप्रतिनिधि और प्रशासन तक पहुंचता है। यही वजह है कि ‘सरकार की योजना’ और ‘जमीन पर उसका असर’ के बीच का अंतर 2027 की राजनीतिक बहस में महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है।
भाजपा की अपनी जमीनी बैठकों में भी पार्टी कार्यकर्ताओं की प्रशासन तक शिकायत न पहुंच पाने और स्थानीय स्तर पर सुनवाई की समस्या का मुद्दा सामने आने की खबरें आई हैं।
जीरो टॉलरेंस’ का असली इम्तिहान सड़क पर
सरकार भ्रष्टाचार और लापरवाही के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति की बात करती है। ऐसे में जनता की अपेक्षा सिर्फ अधिकारियों को निर्देश देने की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने और उसका परिणाम दिखाने की है।
सरकारी वाहन और ईंधन जैसे संसाधनों के कथित निजी दुरुपयोग की शिकायतें यदि कहीं सामने आती हैं तो उनकी जांच होना जरूरी है। बिना जांच किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार या सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप तय नहीं किया जा सकता।
लेकिन सवाल यह जरूर है कि सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने वाली पूरी मशीनरी की फील्ड में मौजूदगी और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी
राजधानी की जनता के लिए चुनावी मौसम में मुद्दा किसी एक दल या अधिकारी का नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी सुविधाओं का है। गड्ढामुक्त सड़क, सुचारु यातायात, जलभराव से राहत और सरकारी दफ्तरों में सुनवाई—इनका असर भाषण से ज्यादा सड़क पर दिखाई देता है।
यही कारण है कि 2027 की चुनावी राजनीति गर्म होने के साथ लखनऊ में एक सवाल और महत्वपूर्ण होता जा रहा है—सरकार के पास योजनाएं और बजट तो हैं, लेकिन उनका असर जनता की रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी तेजी से दिखाई देता है? आने वाले महीनों में यही सवाल स्थानीय राजनीति की दिशा तय करने वाली बहसों में शामिल रह सकता है।




