उद्यमी मजबूत होगा तो बैंक का पैसा भी सुरक्षित रहेगा’, 2047 के विकसित भारत के लिए बैंक, सरकार और उद्यमियों के बीच बेहतर समन्वय पर दिया जोर
नए उद्योगों पर समय से पहले वसूली का दबाव न बनाएं बैंक, योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की उठाई मांग
प्रयागराज उत्तर प्रदेश/Etv News 24/संवाददाता वागीश
प्रयागराज आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका केवल ऋण उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे नए उद्यमों को स्थापित करने, रोजगार सृजन और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने में भी सहभागी बनना चाहिए। यह बात भारतीय जनता पार्टी के एनजीओ प्रकोष्ठ के प्रांत सह-संयोजक रजनीकांत श्रीवास्तव ने हिंदुस्तान युवा उत्थान समिति की ओर से ‘आत्मनिर्भर भारत 2047 में बैंकों की भूमिका’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में कही।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत, लोकल फॉर वोकल और स्वदेशी के संकल्प को साकार करने में छोटे उद्यमियों, एमएसएमई, कारीगरों, स्थानीय उत्पादकों और एक जिला-एक उत्पाद (ओडीओपी) से जुड़े व्यवसायों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य तभी हासिल होगा, जब गांवों, कस्बों और जिलों में रोजगार देने वाले छोटे उद्योग मजबूत होंगे। इसके लिए सरकार, बैंक और उद्यमियों के बीच विश्वास, संवाद और समन्वय जरूरी है।
रजनीकांत श्रीवास्तव ने कहा कि केंद्र और प्रदेश सरकार प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी), क्रेडिट गारंटी योजनाओं तथा ओडीओपी और एमएसएमई से संबंधित योजनाओं के माध्यम से युवाओं और छोटे उद्यमियों को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य केवल ऋण वितरित करना नहीं, बल्कि सफल और टिकाऊ उद्यम स्थापित करना होना चाहिए।
व्यवसाय शुरू होने से पहले वसूली का दबाव उचित नहीं
श्रीवास्तव ने कहा कि कई बार नए उद्यमियों को उत्पादन शुरू होने, बाजार विकसित होने और पर्याप्त नकदी प्रवाह बनने से पहले ही ऋण वसूली के दबाव का सामना करना पड़ता है। उद्योग स्थापित करने में भवन, मशीनरी, कच्चे माल, कर्मचारियों, विपणन और बाजार तैयार करने में समय लगता है। ऐसे में शुरुआती दौर में अत्यधिक दबाव उद्यमी की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है और व्यवसाय के सामने संकट खड़ा हो सकता है।
उन्होंने कहा कि बैंक का पैसा सुरक्षित रहना जरूरी है, लेकिन उद्यमी का व्यवसाय सुरक्षित रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब तक व्यवसाय चलेगा नहीं, उत्पादन बढ़ेगा नहीं और रोजगार पैदा नहीं होगा, तब तक ऋण चुकाने की क्षमता भी मजबूत नहीं हो सकती। इसलिए बैंक अधिकारियों को उद्यमियों की वास्तविक परिस्थितियों को समझते हुए नियमों के दायरे में व्यावहारिक समाधान तलाशने चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि शाखा प्रबंधक, क्षेत्रीय कार्यालय और जोनल स्तर के अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी से कई बार उद्यमियों की समस्याएं बढ़ जाती हैं। एक ही मामले में अलग-अलग निर्देश मिलने से उद्यमी असमंजस में पड़ जाता है और उसका समय तथा कारोबार प्रभावित होता है। बैंकिंग व्यवस्था में संवाद, पारदर्शिता और समस्या के समाधान पर आधारित दृष्टिकोण को मजबूत करने की जरूरत है।
इंडियन बैंक सहित अन्य मामलों को संबंधित अधिकारियों के संज्ञान में लाने की बात
रजनीकांत श्रीवास्तव ने कहा कि उद्यमियों को परेशान किए जाने से संबंधित कुछ मामले सामने आए हैं, जिनमें इंडियन बैंक सहित अन्य बैंकों से जुड़े प्रकरण भी बताए गए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों को संबंधित अधिकारियों के संज्ञान में लाया जाएगा और तथ्यों के आधार पर उनकी समीक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि किसी स्तर पर नियमों के विपरीत कार्रवाई या अनावश्यक दबाव से उद्यमियों को नुकसान पहुंचता है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सरकार की उद्यमिता को प्रोत्साहित करने वाली योजनाओं का लाभ लाभार्थियों तक पहुंचना चाहिए। किसी भी स्तर पर लापरवाही या अनुचित व्यवहार से उद्यमियों का विश्वास प्रभावित नहीं होना चाहिए। उन्होंने नागरिकों से भी अपील की कि यदि उनके संज्ञान में बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ा ऐसा कोई प्रकरण आता है, जिसमें उद्यमी को अनावश्यक रूप से परेशान किया जा रहा हो, तो उपलब्ध तथ्यों के साथ इसकी जानकारी संबंधित स्तर पर दें।
सरकार और आरबीआई से व्यावहारिक व्यवस्था बनाने की मांग
श्रीवास्तव ने केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक से छोटे उद्यमियों की समस्याओं पर ध्यान देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि ओडीओपी, एमएसएमई और स्वदेशी उत्पादन से जुड़े नए उद्योगों के लिए परियोजना की प्रकृति और संभावित आय को ध्यान में रखते हुए ऋण चुकाने की व्यावहारिक व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।
उन्होंने नए उद्यमों के लिए उचित मॉरेटोरियम और पुनर्भुगतान अवधि, वास्तविक कठिनाइयों का सामना कर रहे संभावनाशील कारोबारों के ऋण पुनर्गठन, शिकायतों के समयबद्ध निस्तारण तथा बैंक शाखाओं और उच्च अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय की व्यवस्था विकसित करने की मांग की। साथ ही, उद्यमियों को वित्तीय सहायता के साथ विपणन, डिजिटल बिक्री, ब्रांडिंग, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं की नियमित समीक्षा होनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि उनका लाभ वास्तव में छोटे उद्यमियों तक पहुंच रहा है या योजनाएं केवल ऋण वितरण के आंकड़ों तक सीमित रह गई हैं।
समाजसेवियों और स्वयंसेवकों से सहयोग की अपील
श्रीवास्तव ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत का निर्माण केवल सरकार और बैंकों की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें गैर सरकारी संगठनों, स्वयंसेवकों, समाजसेवियों, विधि क्षेत्र से जुड़े लोगों और उद्यमियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। बैंकिंग और वित्तीय समस्याओं से जूझ रहे जरूरतमंद उद्यमियों को उचित मार्गदर्शन और समाधान दिलाने के लिए समाज के जागरूक लोगों को आगे आना चाहिए।
उन्होंने बैंकिंग एवं उद्यमिता से संबंधित मामलों में जरूरतमंदों की सहायता कर रहे समाजसेवियों, स्वयंसेवकों और विधि क्षेत्र से जुड़े लोगों से अपना नाम, मोबाइल नंबर तथा जिस व्यक्ति या उद्यमी की वे सहायता कर रहे हैं, उसका नाम और मोबाइल नंबर 9415970989 पर भेजने की अपील की। उन्होंने कहा कि ऐसे सहयोगियों को आगामी कार्यक्रम में सम्मानित और प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाएगा।
श्रीवास्तव ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी साकार होगा, जब बैंक और उद्यमी एक-दूसरे को विरोधी नहीं, बल्कि आर्थिक विकास के साझेदार के रूप में देखेंगे। उन्होंने कहा, “उद्यमी मजबूत होगा तो बैंक का पैसा भी सुरक्षित होगा।” छोटे उद्योगों, स्थानीय उत्पादकों और रोजगार सृजन करने वाले कारोबारों को प्रोत्साहन देकर ही वर्ष 2047 के विकसित एवं आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को वास्तविक रूप दिया जा सकता है।




