यूपी की सियासत में नया मोड़! ओवैसी बोले- अकेले नहीं रोक सकते भाजपा को, बातचीत के दरवाजे खुले
2027 से पहले विपक्षी खेमे में हलचल, ओवैसी ने दिया गठबंधन का न्योता; अब सपा-कांग्रेस समेत दलों की नजर
लखनऊ उत्तर प्रदेश/Etv News 24/संवाददाता वागीश कुमार
उत्तर प्रदेश सूत्रों के मुताबिक जानकारी के अनुसार विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोकने के उद्देश्य से विपक्षी दलों के सामने गठबंधन का खुला प्रस्ताव रखा है। ओवैसी ने कहा कि कोई भी विपक्षी दल अकेले भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकता। अगर भाजपा को रोकना है तो समान विचार रखने वाले दलों को साथ आकर बातचीत करनी होगी।
ओवैसी के इस बयान को यूपी की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने साफ कहा कि उनकी पार्टी ऐसे दलों के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है, जो भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के समान उद्देश्य पर साथ चलना चाहते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस बार चुनावी समीकरण पिछले चुनावों से अलग हो सकते हैं।
अकेले मुकाबला संभव नहीं’—विपक्षी एकजुटता पर जोर
ओवैसी का ताजा रुख ऐसे समय सामने आया है, जब यूपी में प्रमुख राजनीतिक दल 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं। एआईएमआईएम पहले ही प्रदेश में अपना संगठन मजबूत करने और चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। पार्टी ने गठबंधन की संभावनाएं खुली रखने की बात भी कही है।
इससे पहले भी ओवैसी यूपी में भाजपा को सत्ता में लौटने से रोकने के लिए गठबंधन की इच्छा जता चुके हैं। जून 2026 में उन्होंने कहा था कि गठबंधन में उन्हें सम्मान और बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए।
सपा-कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के लिए बढ़ी सियासी दिलचस्पी
ओवैसी के प्रस्ताव के बाद अब नजर इस बात पर है कि उत्तर प्रदेश में विपक्षी दल इस पहल को किस रूप में लेते हैं। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव पहले कह चुके हैं कि भाजपा को कमजोर करने वाली राजनीतिक ताकतों का स्वागत है, जबकि कांग्रेस की ओर से ओवैसी के साथ गठबंधन को लेकर अलग रुख सामने आया है।
यानी चुनाव से पहले यूपी के विपक्षी खेमे में गठबंधन की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है। एक तरफ ओवैसी बातचीत के दरवाजे खुले रखने की बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर सपा-कांग्रेस समेत दूसरे दलों की अपनी-अपनी राजनीतिक रणनीति है। ऐसे में आने वाले महीनों में सीट बंटवारे, नेतृत्व और साझा रणनीति को लेकर होने वाली बातचीत यूपी की चुनावी सियासत की दिशा तय करने वाले प्रमुख घटनाक्रमों में शामिल हो सकती है।
फिलहाल ओवैसी का संदेश साफ है—भाजपा के खिलाफ मुकाबले के लिए विपक्षी दलों को साथ लाने की कोशिश जारी रहेगी। अब असली सवाल यह है कि उनके इस ऑफर पर दूसरे दल क्या रुख अपनाते हैं।




