सासाराम रोहतास/ Etv News 24
देश में अब मंहगाई सिर्फ एक आर्थिक संकेतक नहीं रही, बल्कि इसे विकास का नया पैमाना बना दिया गया है। बाजार में जब भी दाम बढ़ते हैं, तो इसे “प्रगति” की कहानी कहकर परोसा जाता है। सवाल यह है कि क्या सचमुच विकास वही है, जिसमें आम आदमी की पहुंच जरूरी चीजों से लगातार दूर होती जाए ? आज स्थिति यह है कि जिस दिन पेट्रोल, डीजल या खाद्य वस्तुओं के दाम स्थिर रहते हैं, उस दिन जैसे “विकास” की रफ्तार थम गई हो। मानो संसद में लंबे घंटों की मेहनत का सीधा संबंध बाजार में बढ़ते दामों से हो। यह धारणा धीरे-धीरे गढ़ी जा रही है कि महंगाई जितनी तेज होगी, देश उतनी ही तेजी से आगे बढ़ेगा।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अब महंगाई को सामान्य मान लेने की मानसिकता विकसित हो रही है। आम नागरिक रोज बढ़ती कीमतों को देखकर खुद को समझाने लगा है कि शायद यही “नए भारत” की पहचान है। लेकिन क्या यह आत्मसंतोष नहीं, बल्कि मजबूरी की स्वीकृति है ?एक ओर आम जनता रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं दूसरी ओर बड़े कॉर्पोरेट घरानों को राहत देने की खबरें बार-बार सामने आती हैं। यदि हर साल लाखों करोड़ के ऋण माफ किए जा सकते हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि उसी संवेदनशीलता के साथ आम उपभोक्ता को राहत क्यों नहीं मिलती ?व्यंग्य यह है कि अब देशभक्ति का पैमाना भी बदलता नजर आ रहा है—जितनी महंगाई, उतना अधिक “विकास” और उतनी ही बड़ी उपलब्धि! लेकिन हकीकत यह है कि बढ़ती कीमतें किसी भी अर्थव्यवस्था की मजबूती नहीं, बल्कि संतुलन बिगड़ने का संकेत होती हैं।जरूरत इस बात की है कि विकास के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच की खाई को समझा जाए। मंहगाई को उपलब्धि के रूप में पेश करने के बजाय उसे नियंत्रित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।क्योंकि अंततः देश की ताकत आंकड़ों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की आर्थिक स्थिरता और संतुष्टि से तय होती है।




