वर्दी के पीछे भी धड़कता है एक दिल, घर पर इंतजार करता है परिवार; बिहार पुलिस एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष ने पुलिसकर्मियों की चुनौतियों और सम्मान का उठाया मुद्दा
पटना बिहार/Etv News 24/ब्यूरो रिपोर्ट
लोकतंत्र में अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करना और सरकार से सवाल पूछना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन आंदोलन के नाम पर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार, गाली-गलौज और हिंसा किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। पुलिसकर्मी भी इसी समाज का हिस्सा हैं। वर्दी के पीछे उनका भी एक परिवार है, उनकी भी भावनाएं हैं और घर पर उनके सुरक्षित लौटने का इंतजार करने वाले अपने लोग हैं। यह बातें बिहार पुलिस एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कही हैं।
उन्होंने कहा कि पुलिस किसी सरकार, राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष की निजी सेना नहीं, बल्कि संविधान और कानून की प्रहरी है। उसका दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना, आम नागरिकों की सुरक्षा करना, अपराधियों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई करना और न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करना है। इसलिए किसी मंत्री या अधिकारी के इस्तीफे की मांग को लेकर होने वाले आंदोलन में व्यवस्था संभाल रहे पुलिसकर्मियों को निशाना बनाना उचित नहीं है।
12 से 24 घंटे तक करनी पड़ती है ड्यूटी
मृत्युंजय सिंह ने कहा कि पुलिस की नौकरी सामान्य सरकारी नौकरी की तरह निर्धारित समय तक सीमित नहीं है। पुलिसकर्मियों को कई बार 12, 16 यहां तक कि 24 घंटे तक लगातार ड्यूटी करनी पड़ती है। चुनाव, आंदोलन, त्योहार, बाढ़, दंगा और वीआईपी दौरे जैसी परिस्थितियों में सबसे पहले पुलिसकर्मी ही मोर्चे पर तैनात रहते हैं। त्योहारों में जब लोग अपने परिवार के साथ खुशियां मनाते हैं, तब पुलिसकर्मी घर-परिवार से दूर सड़कों पर सुरक्षा व्यवस्था संभालते हैं।
उन्होंने कहा कि कई बार पुलिसकर्मी रात में घर लौटते हैं तो बच्चे सो चुके होते हैं और सुबह जब बच्चे स्कूल जाने के लिए उठते हैं, तब पिता आराम कर रहा होता है। इस तरह बच्चों और परिवार के साथ समय बिताने का अवसर भी उन्हें कम मिल पाता है। स्टाफ और संसाधनों की कमी, राजनीतिक दबाव तथा जनता के आक्रोश के बीच पुलिसकर्मियों को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है।
विभागीय समस्याओं और मानसिक तनाव पर भी जताई चिंता
बिहार पुलिस एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष ने पुलिस विभाग के अंदर कनीय कर्मियों की समस्याओं की ओर भी ध्यान आकृष्ट कराया। उन्होंने कहा कि पारिवारिक जरूरतों के बावजूद पुलिसकर्मियों को समय पर छुट्टी नहीं मिल पाती। घर में शादी हो, बच्चे की तबीयत खराब हो या माता-पिता अस्पताल में हों, कई बार उन्हें छुट्टी के लिए इंतजार करना पड़ता है।
उन्होंने विभागीय कार्रवाई में अनावश्यक देरी, वरीय अधिकारियों के व्यवहार और पदोन्नति में असमानता को भी चिंता का विषय बताया। उनके अनुसार, जहां वरीय अधिकारियों की पदोन्नति निर्धारित समय पर हो जाती है, वहीं कनीय पुलिसकर्मी वर्षों तक पदोन्नति की प्रतीक्षा करते रहते हैं। इससे उनका मनोबल प्रभावित होता है। उन्होंने समयबद्ध पदोन्नति, पारदर्शी स्थानांतरण नीति और विभागीय मामलों के त्वरित निष्पादन की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मी भी मशीन नहीं हैं। उन्हें भी समय पर भोजन, पर्याप्त आराम, परिवार के साथ समय और बेहतर कार्य वातावरण की जरूरत है। लगातार ड्यूटी और दबाव के बीच उनके मानसिक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान का ध्यान रखना भी जरूरी है। अनुशासन का अर्थ कनीय कर्मियों की मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी करना नहीं है।
पुलिस और जनता एक-दूसरे के पूरक, विरोधी नहीं
मृत्युंजय सिंह ने कहा कि पुलिसकर्मियों के सम्मान की जिम्मेदारी केवल समाज की नहीं, बल्कि सरकार और पुलिस नेतृत्व की भी है। पुलिस बल में पर्याप्त नियुक्तियां, आधुनिक संसाधन, बेहतर कार्य परिस्थितियां, निर्धारित कार्य अवधि और समय पर पदोन्नति सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस पहल होनी चाहिए। वरीय अधिकारियों को भी अपने अधीनस्थों की समस्याओं को संवेदनशीलता से समझना चाहिए।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हर आंदोलनकारी गलत नहीं होता और हर पुलिसकर्मी का प्रत्येक कदम सही नहीं हो सकता। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है। यदि कोई पुलिसकर्मी कानून के विरुद्ध कार्रवाई करता है या किसी नागरिक के साथ दुर्व्यवहार करता है, तो उसके विरुद्ध निष्पक्ष जांच और कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। इसी तरह पुलिस को भी आंदोलनकारियों के लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान करना चाहिए और अनावश्यक बल प्रयोग से बचना चाहिए।
आंदोलन कीजिए, लेकिन किसी की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाइए
उन्होंने आंदोलनकारियों से अपील करते हुए कहा कि सरकार से सवाल पूछिए, नीतियों का विरोध कीजिए और अपनी मांगों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष कीजिए, लेकिन ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को गाली देकर, अपमानित कर या उकसाकर आंदोलन को सुर्खियों में लाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मी किसी का दुश्मन नहीं है। वह उसी समाज की सुरक्षा में लगा है, जिसका वह स्वयं हिस्सा है। एक ओर पुलिस को जनता की पीड़ा समझनी होगी, तो दूसरी ओर जनता को भी पुलिसकर्मियों की परिस्थितियों और जिम्मेदारियों को समझना होगा।
अपने संदेश में मृत्युंजय कुमार सिंह ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज बुलंद होनी चाहिए, लेकिन इतनी भी नहीं कि इंसान की गरिमा ही दब जाए। आंदोलन आपका अधिकार है, अपमान आपका अधिकार नहीं। वर्दी का सम्मान, नागरिकों के अधिकारों का सम्मान और कानून के प्रति निष्ठा ही मजबूत लोकतंत्र एवं बेहतर समाज की पहचान है।




