प्रियांशु कुमार समस्तीपुर बिहार/Etv News 24
व्यूह के सामने अंधी सत्ता,धृतराष्ट्र, दुर्योधन और राजनीति का भयभगवद्गीता के प्रथम अध्याय का दूसरा श्लोक केवल युद्ध की एक स्थिति का वर्णन नहीं करता, बल्कि सत्ता, भय और नेतृत्व की उस मानसिकता को उजागर करता है, जो बाहर से शक्तिशाली और भीतर से असुरक्षित होती है।सञ्जय उवाच—“दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदाआचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥”संजय बताते हैं कि पाण्डवों की सुव्यवस्थित और रणनीतिक रूप से सजी हुई सेना को देखकर राजा दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास गया। यह दृश्य जितना युद्ध का है, उतना ही राजनीति का भी।इस प्रसंग की पृष्ठभूमि में धृतराष्ट्र का चरित्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। धृतराष्ट्र जन्म से अंधा था, किंतु दुर्भाग्यवश वह आध्यात्मिक दृष्टि से भी वंचित था। वह जानता था कि जैसे वह स्वयं धर्म को देख पाने में असमर्थ है, वैसे ही उसके पुत्र भी धर्म के मामले में अंधे हैं। उसे यह भी स्पष्ट था कि पाण्डवों के साथ किसी समझौते की संभावना नहीं है, क्योंकि पाँचों पाण्डव जन्म से ही धर्मनिष्ठ और पवित्र थे। यही कारण है कि तीर्थभूमि कुरुक्षेत्र का प्रभाव भी उसे संदेह में डालता है।आधुनिक राजनीति में भी सत्ता में बैठे कई शासक इसी धृतराष्ट्र-मानसिकता से ग्रस्त दिखाई देते हैं—जहाँ सत्ता है, पर नैतिक स्पष्टता नहीं। दुर्योधन के पास सेना, संसाधन और संख्या है, फिर भी पाण्डवों की व्यूहरचना उसे विचलित कर देती है। यह बताता है कि व्यूह केवल सैन्य संरचना नहीं, बल्कि नैतिक और संगठनात्मक तैयारी का प्रतीक है।दुर्योधन का गुरु के पास जाना इस सत्य को उजागर करता है कि संकट के क्षणों में सत्ता स्वयं निर्णय लेने से हिचकती है और वैधता विशेषज्ञों से उधार लेने का प्रयास करती है। “राजा” कहलाने के बावजूद उसका यह व्यवहार दिखाता है कि पद और आत्मविश्वास समान नहीं होते।गीता का यह संदेश राजनीति के लिए स्पष्ट है:जब सत्ता धर्म से कट जाती है, तब वह सुव्यवस्थित नैतिक रणनीति के सामने भयभीत हो जाती है और जब नेतृत्व आध्यात्मिक रूप से अंधा हो, तब संघर्ष अपरिहार्य बन जाता है।



