करगहर रोहतास /Etv News 24
दुर्गा सप्तशती के ‘देव्यपराध-क्षमापन-स्तोत्र’ के द्वितीय चरण में वर्णित पचासी वर्ष की उम्र में सुधार की आवश्यकता है । उक्त बातें स्थानीय शिव मंदिर परिसर में बुधवार की शाम आयोजित प्रवचन के दौरान आचार्य पंडित राम अवधेश चतुर्वेदी ने कही ।उन्होंने कहा कि मार्कंडेय पुराण से उद्धृत दुर्गा-सप्तशती पाठ करने के दौरान ‘देव्यपराध-क्षमापन स्तोत्र ‘का पाठ हम सभी करते हैं । पाठ में किंचित किसी भी प्रकार का अपराध हो गया हो तो उसके लिए अंकित ‘देव्यपराध-क्षमापन-स्तोत्र’ पढ़ते हैं । यह देव्यपराध-क्षमापन-स्तोत्र मार्कंडेय पुराण का नहीं, आदि शंकराचार्यकृत नहीं और नहीं अन्य पुराणों का ही अंश है । यह अंश पूर्व के पीठासीन किसी शिवभक्त और शंकराचार्य कृत है । देव्यपराध-क्षमापन-स्तोत्र के पंचम श्लोक में ‘परित्यक्ता देवा विविध विधिसेवाकुलतया ,मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापिभविता,निरालम्बो लम्बोदर-जननि कं यामि शरणम्।। यानी हे माता!भांति-भांति से देवताओं की पूजा करने पर भी जब हृदय में व्याकुलता ही बनी रही तो मैं उन सभी देवताओं को छोड़ दिया।अब इस 85 वर्ष से अधिक प्राप्त उम्र में आपकी शरण में आ चुका हूं । यदि इस समय आपकी कृपा न हो तो हे लम्बोदर गणेश की माता! अब यह असहाय सेवक किसकी शरण में जाएगा ? लिखा गया है ।उन्होंने बताया कि आदि शंकराचार्य का देहावसान 32 वर्ष की उम्र में ही हो गई थी । इससे स्पष्ट है कि यह अंश आदि शंकराचार्य द्वारा रचित नहीं है । देव्यपराध-क्षमापन-स्तोत्र की रचना किसी पीठासीन भक्त ने स्वयं के लिए किया है । जो प्रत्येक आयु वर्ग के वाचनकर्ताओं पर उम्र के हिसाब से सही नहीं बैठता और हम सभी मिथ्या रूप से इस शब्द की पुनरावृत्ति करते आ रहे हैं । देव्यपराध-क्षमापन-स्तोत्र में पचासी वर्ष का उच्चारण मिथ्या प्रतीत होता है क्योंकि भक्तो की उम्र अलग-अलग है फिर भी भगवती के सामने वह पचासी वर्ष से अधिक उम्र का उदघोष कर रहा है । बताया कि उक्त बिंदु पर सभी विद्वज्जनों से आग्रह है कि इस श्लोक के द्वितीय चरण में सुधार कर उसी छन्द में ऐसा श्लोक-पादपूर्ति किया जाय ताकि वाचनकर्ताओं के लिए सही हो।



