प्रियांशु कुमार समस्तीपुर बिहार/Etv News 24
धर्मक्षेत्र में सत्ता की राजनीतिभगवद्गीता के पहले अध्याय का पहला श्लोक और आधुनिक नेतृत्वराजनीति का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि सत्ता किसके पास है, बल्कि यह होता है कि उस सत्ता के पीछे नैतिक वैधता है या केवल अधिकार। भगवद्गीता का पहला श्लोक इसी प्रश्न के साथ आरंभ होता है—और आज की राजनीति के लिए यह एक गहरी चेतावनी है।धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥अर्थात—धर्म की भूमि कुरुक्षेत्र में, युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया? यह प्रश्न धृतराष्ट्र पूछते हैं—जो सत्ता में हैं, पर युद्धभूमि से दूर। उनका अंधापन केवल शारीरिक नहीं, बल्कि नैतिक है। प्रश्न जिज्ञासा नहीं, भय से उपजा है; क्योंकि उन्हें अपने पक्ष की संख्या पर भरोसा है, पर उसके कर्मों की वैधता पर नहीं।“धर्मक्षेत्र” बताता है कि संघर्ष केवल सत्ता का नहीं, बल्कि न्याय और नैतिकता का है। “कुरुक्षेत्र” यह स्मरण कराता है कि राजनीति में हर निर्णय का परिणाम अनिवार्य होता है। “मामकाः” शब्द यह उजागर करता है कि जब सत्ता निजी संपत्ति बन जाती है, तब संघर्ष अवश्यंभावी हो जाता है।आज की राजनीति में हर चुनाव एक कुरुक्षेत्र है। संसाधन, प्रचार और बहुमत जीत की गारंटी नहीं देते। निर्णायक वह नैरेटिव होता है जो जनता के विवेक को छूता है। संकट के समय वही नेतृत्व टिकता है, जो निर्णय लेता है—सिर्फ प्रश्न नहीं पूछता।गीता का संदेश स्पष्ट है:- जो सत्ता धर्म से कट जाती है, वह संघर्ष को जन्म देती है; और जो धर्म के साथ खड़ी होती है, वही इतिहास और जनमत—दोनों में विजयी होती है।— निखिल कुमार राजनीतिक रणनीतिकार और सलाहकार



