मायावती के उत्तराधिकार को लेकर पार्टी में समय-समय पर चर्चाएं
बहनजी के किले में दरार! कभी इशारे पर कांपती थी सत्ता, अब परिवार को लेकर मायावती की चिंता चर्चा में
लखनऊ उत्तर प्रदेश/Etv News 24/संवाददाता वागीश कुमार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी ऐसा दौर था, जब मायावती की एक आवाज सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर देती थी। अफसरशाही से लेकर राजनीतिक दलों तक उनके फैसलों की चर्चा होती थी और बसपा का नीला झंडा प्रदेश की सियासत में मजबूत ताकत का प्रतीक माना जाता था। मगर बदलते राजनीतिक दौर में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति कमजोर हुई है। अब मायावती के सार्वजनिक रूप से सामने आ रहे बयानों और संदेशों ने पार्टी के भीतर नेतृत्व, परिवार और उत्तराधिकार को लेकर नई राजनीतिक चर्चा छेड़ दी है।
कांशीराम के आंदोलन से सत्ता के शिखर तक पहुंची बसपा, अब नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवाल
1984 में मान्यवर कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कर वंचित और बहुजन समाज को राजनीतिक भागीदारी दिलाने का अभियान शुरू किया। मायावती ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए बसपा को उत्तर प्रदेश की सत्ता के शिखर तक पहुंचाया। वर्ष 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। वर्ष 2007 में बसपा ने 206 विधानसभा सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई तो मायावती ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी निर्णायक ताकत साबित की।हालांकि 2012 के बाद पार्टी का जनाधार लगातार कमजोर हुआ। 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। इसके बाद 2019 में गठबंधन के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिली और 2022 के विधानसभा तथा 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन और कमजोर हुआ। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने राजनीतिक आधार को फिर मजबूत करने की है।




