कोचस/रमेश कुमार पांडेय Etv News 24
पटवाडीह में आयोजित 25 कुंडीय श्री लक्ष्मीनारायण महायज्ञ सह श्रीशिव प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव के अवसर पर श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन बुधवार को श्रद्धा,आस्था व भक्ति का उफान जोरों पर रहा।श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज के परम शिष्य श्री लक्ष्मी प्रपन्न श्री जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि हमें अपनी व्यवस्था से कभी समझौता नहीं करना चाहिए.इससे मनुष्य का नैतिक ह्रास होता है।हमें सदैव अच्छे कर्म करना चाहिए.इसी का फल सबको भोगना पड़ता है।अच्छे कर्म से ही मनुष्य को प्रशंसा व ख्याति मिलती है।आज मनुष्य हर क्षेत्रों में काफी तरक्की किया है,लेकिन नैतिकता का ह्रास हो रहा है।यह चिंता का विषय है.इसपर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.यह जीवन केवल भोग विलास के लिए नहीं है।मानव शरीर नैतिकता के साथ जीवन जीने के लिए मिला है।कर्म,भक्ति व ज्ञान का मूल आधार सदाचार है.हर व्यक्ति को नियमानुसार संध्या करनी चाहिए।सम्यक प्रकार से भगवान का ध्यान करना संध्या कहलाता है।स्वामी जी ने कहा कि यज्ञ मंडप या भगवान की परिक्रमा एक,चार,27,54 या 108 बार करनी चाहिए.यह भी धर्म है।जिस अनुष्ठान से प्रभु में हमारा प्रेम होता है वह धर्म है।दान,तप व यज्ञ इत्यादि को भी धर्म कहा गया है.जीयर स्वामी जी ने कहा कि नियमित रूप से संध्या वंदन करने से मनुष्य को तीन ऋणों से मुक्ति मिलती है।जन्म लेते ही मनुष्य पर तीन ऋणों का बोझ आ जाता है.जिसमें देव ऋण,पितृ ऋण व ऋषि ऋण शामिल हैं.भगवान के अवतारों की कथा हमे बार बार सुननी चाहिए.ईश्वर ही हमें हर संकट से उबारते है।उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति का रहन-सहन,उठक-बैठक,खान-पान शुद्ध व निर्मल हो,उसे भागवत कथा सुनने का फल मिलता है।दुनिया में अब तक जितने धर्म,पंथ व विचार निकला है व आगे निकलेगा,उसका यदि कोई आधार है तो उसका नाम वैदिक सनातन धर्म है.यह धर्म लगभग 50 हजार करोड़ वर्ष पुराना है।जो काम सरकार व सरकार की शासन व्यवस्था नहीं कर पाती है वो काम संत,शास्त्र व संस्कृति करती है.इससे पूर्व विभिन्न धार्मिक स्थलों से पधारे कथावाचकों ने श्रोताओं को ईश्वर के अलग-अलग कथाओं का रसपान कराया।



