दुर्गापूजा पर ‘इज्जत’ नाटक का मंचन कर ग्रामीण सहेज रहे पूर्वजों की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ देते हैं संदेश
डेहरी ओन सोन रोहतास/Etv News 24
डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव और फिल्मों की चकाचौंध के बीच पारंपरिक नाट्य कला धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुंचती जा रही है। ऐसे दौर में नवीनगर प्रखंड की नाउर पंचायत स्थित बाघाडाबर गांव के ग्रामीण पिछले 61 वर्षों से दुर्गापूजा के अवसर पर नाट्य मंचन की परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं। गांव का 11 स्टार क्लब न केवल पूर्वजों की सांस्कृतिक विरासत को सहेज रहा है, बल्कि नाटक के माध्यम से समाज की कुरीतियों को उजागर कर लोगों को सकारात्मक संदेश देने का भी प्रयास कर रहा है।

दुर्गापूजा की नवमी तिथि पर इस वर्ष भी गांव में ‘इज्जत’ नाटक का मंचन किया गया। स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुति देखने के लिए बड़ी संख्या में महिला और पुरुष दर्शक जुटे। कलाकारों ने अपने अभिनय के जरिए दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक संबंधों का संदेश भी दिया। ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग से आयोजित यह कार्यक्रम गांव की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
पूर्वजों ने रखी थी परंपरा की नींव

गांव के पूर्व मुखिया ओमप्रकाश सिंह के अनुसार, करीब छह दशक पहले ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से नाट्य मंचन की शुरुआत हुई थी। राजेश्वर ठाकुर, रामप्रसाद पासवान, नागा राम, सोनू चौधरी, अजय सिंह, शिवशंकर पासवान, सरयू पासवान, रघु राम, शंकर चौधरी और रामवृत राम सहित कई ग्रामीणों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीमित संसाधनों के बावजूद ग्रामीणों का उत्साह और आपसी सहयोग इस आयोजन की सबसे बड़ी ताकत रहा है।
बुजुर्गों का मार्गदर्शन बना परंपरा की ताकत

शुरुआती दौर में शिवशंकर पासवान नाटकों का निर्देशन करते थे। उनके मार्गदर्शन में स्थानीय कलाकार विभिन्न पात्रों को मंच पर जीवंत करते थे। पिछले करीब दस वर्षों से रामकुमार और मुन्ना सिंह निर्देशन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इस वर्ष आयोजित नाटक में अध्यक्ष आलोक कुमार मिश्रा की भूमिका रही। कलाकारों में मुन्ना सिंह, सुदामा पासवान, बिजेंद्र पासवान, सत्येंद्र सिंह, नरेश पासवान और उपेंद्र पासवान सहित अन्य लोगों ने भाग लिया। सुदामा पासवान ने मंच संचालन किया। आयोजन में मुन्ना सिंह, राजेंद्र पासवान, राजेंद्र कुमार रवि और कुंदन पासवान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मौके पर पंचायत समिति प्रतिनिधि उपेंद्र पासवान, मुन्ना पासवान और पूर्व मुखिया पप्पू सिंह ,तन्नु कुमार, सुमीत पासवान, आर्या, श्री भगवान, सहित कई ग्रामीण उपस्थित रहे।
आने वाली पीढ़ी केवल नाम से न जाने नाटक
ग्रामीणों का मानना है कि आज की युवा पीढ़ी डिजिटल दुनिया, मोबाइल और फिल्मों की चकाचौंध में तेजी से रमती जा रही है। ऐसे में पारंपरिक नाट्य कला के प्रति रुचि कम होना चिंता का विषय है। यदि इस लोकविधा को बचाने के लिए समय रहते प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ी नाटक को केवल एक शब्द के रूप में जानकर रह जाएगी। बुजुर्ग कलाकारों का अनुभव और मार्गदर्शन भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा।
नाटक केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने का प्रभावी माध्यम भी है। इसके जरिए सामाजिक कुरीतियों, आपसी भेदभाव और पारिवारिक समस्याओं को उजागर कर लोगों को सोचने के लिए प्रेरित किया जाता है। बाघाडाबर के ग्रामीणों की यह पहल बताती है कि आधुनिकता के बीच भी सामूहिक प्रयास और सांस्कृतिक चेतना के बल पर लोकपरंपराओं को बचाया जा सकता है। अब जरूरत है कि नई पीढ़ी भी इस विरासत से जुड़े और नाट्य कला की इस मशाल को आगे बढ़ाए।




