चुनाव आयोग के जवाब से नहीं थमे सवाल
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की पड़ताल में दावा—कई फॉर्म में नाम हटाने का कारण दर्ज नहीं; मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने रिपोर्ट को बताया भ्रामक
SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता पर उठे सवाल, आयोग ने आपत्तियों की संख्या सीमित करने के लिए जारी किया नया आदेश
लखनऊ उत्तर प्रदेश/ Etv News 24/संवाददाता वागीश
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की एक पड़ताल में दावा किया गया है कि प्रदेश में 85,854 मतदाताओं के नाम हटाने से संबंधित फॉर्म-7 तैयार किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में नाम हटाने का स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था। रिपोर्ट सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने इसे भ्रामक और गलतियों से भरा बताया। हालांकि, कलेक्टिव का कहना है कि अधिकारी के स्पष्टीकरण से भी उसके
प्रमुख सवालों का समाधान नहीं हुआ है।
कलेक्टिव की नौ अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, निर्वाचन आयोग के ईआरओनेट (ERONET) सॉफ्टवेयर के माध्यम से ये फॉर्म तैयार किए गए थे। रिपोर्ट में दावा किया गया कि कुछ फॉर्म में नाम हटाने की वजह के स्थान पर केवल ‘A’, ‘N’, ‘H’ या ‘E’ जैसे अक्षर दर्ज थे। इस आधार पर मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेजों की वैधता को लेकर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि और संबंधित फॉर्मों का विस्तृत विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी की सफाई, फिर भी उठ रहे सवाल
रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने इंटरनेट मीडिया मंच एक्स पर इसे गलत और भ्रामक बताया था। इसके बाद उन्होंने वीडियो जारी कर अपनी प्रतिक्रिया दी। द रिपोर्टर्स कलेक्टिव के मुताबिक, अधिकारी ने 85,854 फॉर्म तैयार होने के आंकड़े को सीधे तौर पर खारिज नहीं किया, बल्कि प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि फॉर्म-7 के आधार पर जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए, उन्हें सुनवाई के लिए नोटिस भेजे गए थे। इन नोटिसों में संबंधित मतदाताओं के रिकॉर्ड को ‘अनमैप्ड’ अथवा ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ से जुड़ा बताया गया था।

‘अनमैप्ड’ का आशय यहां ऐसे मतदाताओं से है, जिनका रिकॉर्ड निर्धारित मैपिंग प्रक्रिया के तहत संबंधित विवरण से नहीं जुड़ पाया हो। वहीं, ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ का मतलब रिकॉर्ड में तार्किक विसंगति से है। हालांकि, इन श्रेणियों में आने वाले मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया और प्रत्येक मामले में अपनाई गई कार्रवाई का स्पष्ट विवरण जरूरी है।

कलेक्टिव ने सवाल उठाया है कि यदि नाम हटाने के पीछे निर्धारित कारण मौजूद थे, तो संबंधित फॉर्मों में उनका स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं किया गया। दूसरा सवाल यह है कि कुल 85,854 मामलों में कितने मतदाता अनमैप्ड श्रेणी में थे और कितने के रिकॉर्ड में तार्किक विसंगतियां थीं। रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों श्रेणियों का अलग-अलग आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया। ऐसे में आयोग की ओर से विस्तृत आंकड़े और दस्तावेज जारी किए जाने की मांग उठ रही है।
मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिशों का भी दावा
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने अपनी पड़ताल में उत्तर प्रदेश लगे में मुस्लिम मतदाताओं के नाम सामूहिक रूप से हटवाने की 200 से अधिक कोशिशें किए जाने का भी दावा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया में प्रदेश में मतदाताओं की कुल संख्या और संबंधित आवेदनों के आंकड़ों का हवाला दिया था।
कलेक्टिव के मुताबिक, प्रदेश में लगभग 13.39 करोड़ मतदाताओं के मुकाबले ऐसे मामलों की संख्या करीब 4,700 बताकर इसे सीमित बताया गया। हालांकि, इन आंकड़ों के बीच संबंध और संबंधित आवेदनों की वास्तविक प्रकृति को समझने के लिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि ये आवेदन किस श्रेणी के थे, कितने स्वीकार किए गए और कितने मामलों में नाम हटाने की कार्रवाई हुई। केवल आवेदन संख्या के आधार पर किसी विशेष समुदाय के मतदाताओं पर पड़े प्रभाव का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण में किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं कटना चाहिए। इसी तरह, मृत, स्थानांतरित या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया भी निर्धारित नियमों के अनुसार पूरी की जानी चाहिए। इसलिए प्रत्येक मामले में स्पष्ट कारण, नोटिस, सुनवाई और निर्णय का रिकॉर्ड पारदर्शी होना महत्वपूर्ण है।
आपत्तियों की संख्या सीमित करने का आदेश, पारदर्शिता पर बहस तेज
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि नौ अक्टूबर को निर्वाचन आयोग के मुख्यालय ने मतदाताओं के नाम हटाने से संबंधित आपत्तियां दाखिल करने की संख्या सीमित करने का आदेश जारी किया। इसके तहत एक व्यक्ति एक महीने में 30 से अधिक आपत्तियां दाखिल नहीं कर सकेगा। कलेक्टिव ने इस फैसले को एसआइआर प्रक्रिया के दौरान थोक में आवेदन दाखिल करने से जुड़े विवाद के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया है।
इस घटनाक्रम के बाद मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पारदर्शिता, आपत्तियों की जांच और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। एक ओर निर्वाचन आयोग के सामने मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाने की जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी ओर पात्र मतदाताओं के नाम बिना पर्याप्त कारण और उचित प्रक्रिया के हटने से रोकना भी जरूरी है।
पूरे विवाद पर स्थिति स्पष्ट करने के लिए आयोग की ओर से 85,854 फॉर्मों की श्रेणीवार जानकारी, नाम हटाने के दर्ज कारणों, जारी किए गए नोटिसों और अंतिम निर्णयों का विस्तृत विवरण सार्वजनिक किया जाना महत्वपूर्ण होगा। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता हुई या नहीं। फिलहाल, द रिपोर्टर्स कलेक्टिव के दावों और मुख्य निर्वाचन अधिकारी की सफाई के बीच उठे सवालों पर विस्तृत दस्तावेजी स्पष्टीकरण की आवश्यकता बनी हुई है।




