माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात के बाद बढ़ी सियासी हलचल
2027 से पहले गठबंधन के समीकरणों पर टिकी नजर
निषाद समाज के आरक्षण और सम्मान के मुद्दे पर लगातार मुखर
विपक्षी नेता से मुलाकात ने बढ़ाया राजनीतिक तापमान
लखनऊ उत्तर प्रदेश/ Etv News 24/संवाददाता वागीश कुमार
उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन के समीकरण तेजी से करवट लेते नजर आ रहे हैं। योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद की समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। मुलाकात को संजय निषाद ने भले ही शिष्टाचार भेंट बताया हो, लेकिन इसके तुरंत बाद भाजपा को लेकर दिए गए उनके बयान ने सियासी अटकलों को और हवा दे दी है।लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत में संजय निषाद ने कहा कि जब सपा ने उनके लिए दरवाजा बंद किया था, तब वह भाजपा के साथ गए थे। यदि भाजपा उनके लिए दरवाजा बंद करती है तो वह आगे की राजनीतिक संभावनाओं पर विचार करेंगे। उनके इस बयान को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सहयोगी दलों के बीच सीट बंटवारे, राजनीतिक सम्मान और निषाद समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर दबाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।मुलाकात ने बढ़ाई सियासी गर्मीसंजय निषाद ने माता प्रसाद पांडेय से उनके लखनऊ स्थित आवास पर मुलाकात की और इसे शिष्टाचार भेंट बताते हुए विभिन्न समसामयिक विषयों पर चर्चा की। माता प्रसाद पांडेय की तबीयत खराब रहने के बाद उनके आवास पर नेताओं के पहुंचने का सिलसिला भी चल रहा है। इससे पहले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी उनसे मुलाकात कर चुके हैं। हालांकि संजय निषाद की मुलाकात के बाद राजनीतिक गलियारों में इसके अलग-अलग मायने निकाले जाने लगे हैं।सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह महज व्यक्तिगत संबंधों और शिष्टाचार तक सीमित है या फिर चुनावी मौसम में राजनीतिक संदेश भी छिपा है। फिलहाल किसी नए गठबंधन या पाला बदलने की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन संजय निषाद का ताजा बयान भाजपा नेतृत्व के लिए राजनीतिक संदेश के तौर पर जरूर देखा जा रहा है।आरक्षण से लेकर कानून-व्यवस्था तक सरकार पर दबावसंजय निषाद पिछले कुछ समय से निषाद समाज के आरक्षण समेत कई मुद्दों को लेकर अपनी ही सरकार के सामने मुखर रहे हैं। निषाद, केवट, मल्लाह और मझवार समुदाय को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग को लेकर भी वह लगातार आवाज उठाते रहे हैं। हाल में गोंडा में निषाद समाज के व्यापारी विनोद साहनी की हत्या के मामले में भी उन्होंने आंदोलन किया और कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार व प्रशासन पर सवाल उठाए।यही वजह है कि माता प्रसाद पांडेय से उनकी मुलाकात और उसके बाद भाजपा को लेकर दिया गया बयान महज बयानबाजी न रहकर 2027 की चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। निषाद समाज का समर्थन हासिल करने के लिए भाजपा और सपा दोनों की सक्रियता के बीच संजय निषाद का रुख आने वाले दिनों में यूपी की गठबंधन राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।हालांकि अभी संजय निषाद ने भाजपा छोड़ने या सपा में जाने की कोई घोषणा नहीं की है। ऐसे में फिलहाल इसे दबाव की राजनीति, राजनीतिक विकल्प खुले रखने की रणनीति या आने वाले चुनाव के लिए सौदेबाजी की जमीन तैयार करने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि भाजपा नेतृत्व इस बयान पर क्या रुख अपनाता है और निषाद पार्टी के साथ 2027 के चुनावी गठबंधन को लेकर आगे क्या तस्वीर सामने आती है।




