मोहर्रम की 07 वीं तारीख को आग के शोलों पर चलते हुए,ज़ंजीर से लहूलुहान होकर कर्बला में शिया समुदाय ने पेश की खिराजे अकीदत।
तिलौथू रोहतास/ Etv News 24
इस्लामी वर्ष के प्रथम माह मोहर्रम की 07 वीं तारीख शिया समुदाय के लिए खास महत्व रखती है। इस दिन कर्बला के दर्दनाक वाक़यात, ज़ुल्म और बरबरियत को याद करते हुए कर्बला सहित तमाम अज़ा खानों पर मजलिस, मातम और जुलूस का आयोजन किया जाता है। अकीदतमंद सैयदना इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथियों की कुर्बानियों को याद कर उन्हें खिराजे अकीदत पेश करते हैं।

जुलूसों में नौहाख़ानी और मर्सियाख़ानी के ज़रिए कर्बला के शहीदों की याद को ताज़ा किया जाता है। शिया समुदाय हज़रत इमाम हुसैन से मोहब्बत को जाहिर करते हुए सीना-ज़नी (मातम), जंजीरी मातम तथा कुछ स्थानों पर आग के अंगारों पर चलकर अपने अकीदत और हुसैनी होने का मुज़ाहरा करते हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य इमाम हुसैन की सत्य, न्याय, मानवता और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष की भावना को जीवित रखना है।

सन् 680 ईस्वी में कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन ने यज़ीद की ज़ुल्म और बरबरियत की सत्ता के सामने झुकने से इनकार कर दिया था। उन्होंने अपने परिवार और साथियों के साथ सत्य और इंसाफ की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। कर्बला की यह घटना त्याग, धैर्य और धार्मिक मूल्यों की रक्षा का अनुपम उदाहरण मानी जाती है। मोहर्रम की 07 वीं तारीख से ही कर्बला की प्यास, कठिनाइयों और शहादत की यादें और अधिक गहरी हो जाती हैं।

इसलिए इस दिन सभी चौक चौराहों पर सबील यानी मीठे शरबत और ठंडे पानी की तकसीम आम तौर पर की जाती है।श्रद्धालु इमाम हुसैन के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने तथा मानवता, भाईचारे और न्याय के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। यही कारण है कि मोहर्रम केवल शोक का नहीं, बल्कि सत्य और न्याय के लिए संघर्ष की प्रेरणा का भी प्रतीक है।



