46 साल में भाजपा ने किसी नारी का वंदन अभिनंदन करते हुए पार्टी का अध्यक्ष नहीं बनाया
सासाराम (रोहतास) Etv News 24
नारियों से 56 इंच की दूरी बनाकर चलने वाली भाजपा का संसद में त्रिवसीय प्रयास सम्पन्न होने के साथ साथ विफल भी हो गया है। भाजपा पंचम स्वर में नारी वंदना का पाठ की और फिर आखिर में बोरिया-बिस्तर समेटकर चलती बनी कि विपक्ष महिला विरोधी है। इसलिए उसने महिला आरक्षण विधेयक पारित होने ही नहीं दिया। अब भाजपा 46 साल का गबरू नौजवानों जैसा राजनीति दल है लेकिन इन 46 साल में भाजपा ने किसी नारी का वंदन-अभिनंदन करते हुए पार्टी का अध्यक्ष नहीं बनाया। संघ तो 100 साल में भी किसी नारी की वंदना करने का साहस नहीं जुटा सका।पिछले आम चुनाव में 400 पार करने में नाकाम भाजपा को 2023 में ही नारी वंदन की धुन लग गयी थी. भारत में एक भी राजनीतिक दल महिला आरक्षण का विरोधी नहीं है किंतु भाजपा नारी वंदन विधेयक की आड़ में कांग्रेस समेत हर गैर भाजपा दल को नारी विरोधी साबित करने पर आमादा है. भाजपा सरकार एक तरफ आम आदमी से उसका मताधिकार छीनने के लिए एस आई आर चला रही है दूसरी तरफ महिलाओं पर कृपा बरसाने के लिए बिना जनगणना कराए महिला आरक्षण लागू कराना चाहती है. लेकिन बीच में सरकार ने परिसीमन का पेंच भी लगा दिया है.जब आप ये लेख पढ रहे होंगे तब संसद में नारी वंदन के बजाय हंगामा हो रहा होगा. सरकार का मकसद है ही हंगामा कराना ताकि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है वहाँ विपक्ष को महिला विरोधी बताकर वोट गड़बड़ाना है।केंद्र सरकार ने मंगलवार को सांसदों को जो तीन विधेयकों के मसौदे भेजे थे उनमें – पहला, लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करना और दूसरा, संसद के निचले सदन यानी लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना शामिल है. तीसरा विधेयक परिसीमन विधेयक 2026 है।आपको याद होगा कि बैशाखियों पर टिकी मोदी सरकार ने 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम पेश कर महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसके लागू होने को भविष्य में होने वाली जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया था। इसी वजह से, 2023 का ये क़ानून संसद में लगभग सर्वसम्मति से पारित होने के बावजूद कई लोगों ने चिंता जताई थी कि इस आरक्षण को लागू होने में एक दशक से भी अधिक समय लग सकता है.अगर ये तीनों विधेयक पारित हो जाते हैं, तो 2029 के अगले आम चुनाव में इस आरक्षण का रास्ता साफ़ हो सकता है.लेकिन ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि जितना बहुमत चाहिए उतना सरकार के पास है नहीं. हाँ सरकार हमेशा की तरह विपक्ष की परवाह किए बिना ध्वनिमत से इन तीनों विधेयकों को पारित कराने का दुस्साहस कर सकती है, किंतु यदि ऐसा हुआ तो सरकार के लिए आत्मघाती भी हो सकता है.नारी वंदन की नीयत यदि सरकार की होती तो सरकार बिना किसी विरोध के 1993 में स्थानीय और बाद में महिलाओं को दिए आरक्षण की तरह रास्ता अपना सकती थी, पर मन में जब खोट हो तो कोई क्या कर सकता है ?अगले तीन दिन तक यदि सदन चला तो आप महिला आरक्षण के समर्थन पर विपक्ष से ज्यादा सरकार की रुदालियों को बुक्का फाडकर रोते देखेंगे. टीवी देखने वाली महिलाएं संसद की कार्रवाई देखकर मुमकिन है मोदी जी के लिए भाव विभोर हो जाएं। लेकिन हर नेता मोदी जिंदाबाद के नारे लगाए जा सकते हैं। सरकार की ये चाल यदि न चली तो स्थिति खराब हो जाएगी।कुल मिलाकर नारी की वंदना का ये प्रयास समाज की आखों में धूल झोंकने जैसा है। अब ये नारियों पर है कि वे भाजपा की मंशा भांपती हैं या नही?



