अभिभावकों की जेब पर बढ़ता बोझ, निजी स्कूलों और प्रकाशकों की सांठगांठ पर उठे गंभीर सवाल
सासाराम (रोहतास) Etv News 24
जिले में शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। स्कूलों में इस्तेमाल होने वाली पाठ्यपुस्तकों की कीमतों को लेकर अभिभावकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। आम धारणा बनती जा रही है कि कागज़ से छपने वाली इन किताबों के दाम ऐसे वसूले जा रहे हैं, मानो वे “सोने-चांदी” से तैयार की गई हों।स्थानीय स्तर पर कई अभिभावकों का कहना है कि हर साल नए सत्र में स्कूलों द्वारा निर्धारित की गई किताबें केवल चुनिंदा दुकानों पर ही उपलब्ध होती हैं, जहां उनकी कीमत बाजार दर से कहीं अधिक होती है। इससे यह संदेह गहराता है कि स्कूल प्रबंधन और प्रकाशकों के बीच किसी प्रकार की मिलीभगत है।विशेषज्ञों के अनुसार, अच्छी गुणवत्ता वाली मोटी किताब छापने की वास्तविक लागत इतनी अधिक नहीं होती,जितनी कीमतपाठ्य पुस्तकों की कीमत छात्रों से वसूली जाती है। इसके बावजूद, अभिभावकों को मजबूरन वही किताबें खरीदनी पड़ती हैं, क्योंकि स्कूलों में अन्य विकल्प स्वीकार नहीं किए जाते।*शिक्षा माफियाओं का जाल?
समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो यह पूरा तंत्र एक “शिक्षा माफिया” के रूप में उभरता दिख रहा है, जहां—स्कूल अपनी पसंद की किताबें थोपते हैंप्रकाशक ऊंचे दाम तय करते हैंबुक सेलर सीमित वितरण के जरिए कीमत नियंत्रित रखते हैंइस चक्र में सबसे ज्यादा प्रभावित मध्यम और गरीब वर्ग के अभिभावक होते हैं, जिनके लिए बच्चों की पढ़ाई एक आर्थिक बोझ बनती जा रही है।
प्रशासन और मीडिया की भूमिका पर सवाल
यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है कि इतनी बड़ी समस्या के बावजूद, छात्रों और अभिभावकों की इस गंभीर समस्या पर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं होती ?…सांसद ,विधायक ,सदन में ऐसे गंभीर विषय को क्यों नहीं उठाते ?…या व्यापक मीडिया बहस भी इस विषय पर कम ही देखने को मिलती है। अब सवाल उठता है कि क्या इस “खुली लूट” पर निगरानी के लिए बनाई गईं जिम्मेदार संस्थाएं अपनी भूमिका सही से निभा रही हैं? यदि नहीं तो क्यों ?..क्या सरकार ऐसे मसलों से इसलिए दरकिनार रखती जैकी कहीं शिक्षा माफियाओं की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है?… क्या हो समाधान?
एनसीईआरटी/सरकारी पुस्तकों को प्राथमिकता दी जाएनिजी स्कूलों की किताबों की सूची पर नियामक नियंत्रण होएक ही किताब को बार-बार बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगेऑनलाइन और ओपन-सोर्स सामग्री को बढ़ावा दिया जाए।
शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना है, न कि मुनाफा कमाना। यदि समय रहते इस पर सरकारों द्वारा नियंत्रण नहीं किया गया, तो “महंगी शिक्षा” समाज में असमानता को और गहरा कर सकती है। जिससे सरकार की ,निष्पक्ष शिक्षानीति” पर बड़ा सवाल बन रहा है। अब जरूरत है सख्त नीति और पारदर्शिता की, ताकि शिक्षा व्यवस्था पर से “माफिया” का साया हटाया जा सके।और हर वर्ग के आर्थिक कमजोर वर्ग भी अपने बच्चों को स्वतंत्रशिक्षा ग्रहण करवा सकें ।



