तिलौथू रोहतास/Etv News 24
शिक्षक और शिष्य का संबंध भारतीय संस्कृति में अत्यंत पवित्र और सम्मानपूर्ण माना गया है। शिक्षक केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह मार्गदर्शक, प्रेरणास्रोत और जीवन को सही दिशा देने वाला होता है। वहीं शिष्य का कर्तव्य है कि वह अपने गुरु का सम्मान करे, उनकी बातों को गंभीरता से सुने और ज्ञान प्राप्ति के प्रति समर्पित रहे।प्राचीन समय में गुरु-शिष्य का रिश्ता विश्वास, अनुशासन, संस्कार और आदर पर आधारित होता था। गुरु अपने शिष्य को केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते थे। शिष्य भी गुरु को माता-पिता के समान सम्मान देता था।आज के समय में यह संबंध कई जगह कमजोर होता दिख रहा है। छोटी-छोटी बातों पर शिक्षक और शिष्य के बीच विवाद और झगड़े की घटनाएं सामने आती हैं। इसका मुख्य कारण आपसी सम्मान की कमी, अनुशासनहीनता, मोबाइल और सोशल मीडिया का गलत प्रभाव, तथा पारिवारिक संस्कारों में कमी है। कहीं शिक्षक भी लालच में आकर अपने शिष्यों का शोषण करने लगते हैं।और बात बिगड़ जाती है।और कहीं कहीं शिष्यों की भी उदंडता की बातें सामने आती रहती हैं।लेकिन जरूरत इस बात की है कि शिक्षक धैर्य और प्रेम से विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करें और विद्यार्थी भी गुरु का सम्मान बनाए रखें। जब दोनों पक्ष समझदारी, सम्मान और विश्वास के साथ आगे बढ़ेंगे, तभी शिक्षा का सही उद्देश्य पूरा होगा।आज भी गुरु और शिष्य का संबंध उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि गुरु सच्चे मन से शिक्षा दे और शिष्य पूरी निष्ठा से सीखे, तो समाज और राष्ट्र दोनों का विकास संभव है। इसलिए गुरु का सम्मान और शिष्य का समर्पण जीवन में सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।



