हाईकोर्ट के तीन महीने में चुनाव कराने के निर्देश से जगी उम्मीद, लेकिन तारीख और चुनावी क्रम पर संशय बरकरार
गांवों में जनसंपर्क तेज, राजनीतिक दलों की रणनीति और संभावित प्रत्याशियों की तैयारियों पर टिकी निगाहें
प्रयागराज उत्तर प्रदेश/ Etv News 24/ संवाददाता वागीश
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी लगातार बढ़ रही है। गांवों में कहीं संभावित प्रत्याशी मतदाताओं से संपर्क साध रहे हैं तो कहीं पुराने प्रधान अपनी उपलब्धियां गिनाने में जुटे हैं। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य (बीडीसी), ग्राम पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य पद के दावेदारों ने अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है। हालांकि, चुनाव की तारीख और विधानसभा चुनाव के मुकाबले पंचायत चुनाव के क्रम को लेकर असमंजस ने उनकी बेचैनी बढ़ा दी है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने संबंधी निर्देशों की खबर से चुनाव की आस लगाए बैठे दावेदारों में उम्मीद जगी है। इसके बावजूद चुनावी कार्यक्रम को लेकर स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार है। ऐसे में गांवों की चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक पंचायत चुनाव की चर्चा तेज हो गई है। हर कोई यही जानना चाहता है कि चुनावी बिगुल पहले बजेगा या विधानसभा चुनाव के बाद पंचायतों की बारी आएगी।
राजनीतिक समीकरणों के बीच फंसा चुनाव का मुद्दा
पंचायत चुनाव अब केवल गांव की सरकार चुनने का मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसके साथ स्थानीय राजनीतिक समीकरण, सामाजिक समीकरण और आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीतियां भी जुड़ गई हैं। राजनीतिक दलों के लिए पंचायत चुनाव ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर माना जाता है। वहीं, संभावित प्रत्याशी इसे अपनी राजनीतिक पहचान बनाने और भविष्य की राजनीति में जगह तलाशने के मौके के रूप में देख रहे हैं।

चुनाव की तारीख को लेकर अनिश्चितता के बीच दावेदारों के सामने खर्च, जनसंपर्क और समर्थकों को सक्रिय रखने की चुनौती भी है। लंबे समय तक चुनावी माहौल बने रहने से प्रत्याशियों को अपनी रणनीति बार-बार बदलनी पड़ सकती है। हालांकि, चुनाव को लेकर अलग-अलग तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, लेकिन आधिकारिक कार्यक्रम जारी होने तक किसी भी तारीख को अंतिम मानना जल्दबाजी होगी।
गांवों के विकास और जवाबदेही से भी जुड़ा है चुनाव
पंचायत चुनाव की हलचल के बीच ग्रामीण मतदाताओं की उम्मीदें भी कम नहीं हैं। गांवों में सड़क, नाली, पेयजल, साफ-सफाई, जलनिकासी, आवास और सरकारी योजनाओं के लाभ जैसे मुद्दे चुनावी चर्चा के केंद्र में रहने की संभावना है। मतदाता केवल राजनीतिक दावों के बजाय यह भी देखना चाहते हैं कि उनके गांव में विकास कार्य किस स्तर तक पहुंचे और जनप्रतिनिधियों ने समस्याओं के समाधान के लिए कितनी गंभीरता दिखाई।
ऐसे में चुनाव की तारीख तय होने के साथ प्रत्याशियों की असली परीक्षा भी शुरू होगी। उन्हें जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के साथ विकास और जवाबदेही के सवालों का सामना करना पड़ेगा। फिलहाल पंचायत चुनाव की उम्मीद ने गांवों में राजनीतिक गतिविधियां बढ़ा दी हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से चुनावी कार्यक्रम स्पष्ट किए जाने के बाद ही सामने आएगी। तब तक दावेदारों की खुशी आधी और इंतजार पूरा है।




