डेहरी/ रोहतास/ Etv News 24
आनंदवर्तमान समय में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। विश्व व्यवस्था में शक्ति संतुलन लगातार बदल रहा है और आर्थिक कूटनीति अंतरराष्ट्रीय संबंधों का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। ऐसे समय में भारत और यूरोपीय संघ (ई यु ) के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (एफटी ए) केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक कदम माना जा रहा है। वर्ष 2026 में इस समझौते की दिशा में हुई प्रगति ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग को नई दिशा प्रदान की है।
इसे “सभी समझौतों की जननी” कहा जाना इस तथ्य को दर्शाता है कि यह लगभग दो दशकों से चल रहे कूटनीतिक और आर्थिक प्रयासों का परिणाम है।वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अमेरिका द्वारा अपनाई जा रही संरक्षणवादी नीतियों और व्यापार प्रतिबंधों ने विश्व व्यापार संतुलन को चुनौती दी है। अमेरिका की विदेश नीति में अति राष्ट्रवाद, आर्थिक अलगाववाद और वैश्विक ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती रही है। इन नीतियों के कारण कई देशों को वैकल्पिक आर्थिक साझेदारियों की तलाश करनी पड़ी है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच बढ़ता सहयोग इसी परिवर्तनशील वैश्विक व्यवस्था का परिणाम है, जो बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर संकेत करता है।
यूरोपीय संघ के गठन के बाद से भारत के साथ उसके संबंध सामान्यतः सहयोगात्मक रहे हैं। दोनों पक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था में विश्वास रखते हैं। हालांकि शुरुआती वर्षों में यूरोपीय संघ का व्यापार चीन और अमेरिका के साथ अधिक केंद्रित रहा, लेकिन भारत की आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति ने इस स्थिति को धीरे-धीरे बदल दिया। भारत ने अपने आर्थिक सुधारों के माध्यम से विदेशी निवेश और व्यापार को बढ़ावा दिया, जिससे यूरोपीय संघ के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत हुए।कोरोना महामारी ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इस संकट के बाद यूरोपीय देशों का चीन पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर विश्वास कम हुआ। साथ ही चीन में मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर उठते प्रश्नों ने भी यूरोपीय संघ को वैकल्पिक साझेदारों की तलाश के लिए प्रेरित किया। भारत ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए यूरोपीय संघ के साथ आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को मजबूत किया। वर्ष 2022 में व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद की पुनः स्थापना ने दोनों पक्षों के बीच संबंधों को नई गति प्रदान की।
आज भारत विश्व की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बनकर उभरा है। भारत ने अपनी संतुलित आर्थिक कूटनीति और बहुपक्षीय मंचों जैसे ब्रिक्स के माध्यम से वैश्विक व्यापार में नई पहचान स्थापित की है। अमेरिका द्वारा लगाए गए उच्च शुल्क और वैश्विक आर्थिक दबावों के बावजूद भारत ने वैकल्पिक व्यापारिक साझेदारियों को विकसित कर अपनी आर्थिक स्थिरता बनाए रखी है। यही कारण है कि यूरोपीय संघ भारत को एक विश्वसनीय और दीर्घकालिक आर्थिक साझेदार के रूप में देख रहा है।नई दिल्ली में आयोजित 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में मुक्त व्यापार समझौते पर सहमति दोनों पक्षों के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है। वर्तमान में भारत और यूरोपीय संघ के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 136 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है। यह समझौता यूरोप के लिए चीन और अमेरिका पर निर्भरता कम करने में सहायक सिद्ध होगा, जबकि भारत के लिए यह विश्व के सबसे बड़े एकल बाजार तक सहज पहुँच सुनिश्चित करेगा। यह समझौता वैश्विक आर्थिक स्थिरता और संतुलन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।यह मुक्त व्यापार समझौता वस्तुओं पर शुल्क समाप्त करने या कम करने, सेवा क्षेत्र में व्यापार को उदार बनाने तथा निवेश प्रवाह को बढ़ाने पर केंद्रित है। भारत और यूरोपीय संघ मिलकर वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 25 प्रतिशत तथा विश्व व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा नियंत्रित करते हैं। इस समझौते का लक्ष्य वर्ष 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करना है। इससे न केवल दोनों क्षेत्रों की आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को भी स्थिरता प्राप्त होगी।समझौते के तहत यूरोपीय संघ भारत के 99 प्रतिशत से अधिक निर्यात को शुल्क मुक्त पहुँच प्रदान करेगा। इससे भारतीय उद्योगों, विशेष रूप से श्रम प्रधान क्षेत्रों को अत्यधिक लाभ मिलने की संभावना है। वस्त्र, परिधान, चमड़ा, रत्न एवं आभूषण तथा समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों में निर्यात वृद्धि से रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होंगे। दूसरी ओर भारत चरणबद्ध तरीके से यूरोपीय संघ के लगभग 92 से 97 प्रतिशत उत्पादों पर शुल्क समाप्त करेगा, जिससे भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद उपलब्ध होंगे।इस समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारत ने अपने संवेदनशील क्षेत्रों जैसे डेयरी, कृषि और पशुपालन को सुरक्षित रखने में सफलता प्राप्त की है। यह भारत की संतुलित और दूरदर्शी आर्थिक नीति को दर्शाता है। भारत ने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए वैश्विक व्यापारिक साझेदारी को संतुलित रूप से आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। यह निर्णय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र की सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।यूरोपीय संघ की लग्जरी कारों जैसे मर्सिडीज और बीएमडब्ल्यू को भारतीय बाजार में कम शुल्क पर प्रवेश मिलने की संभावना है। इससे भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे तकनीकी उन्नति और गुणवत्ता सुधार को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि इसके साथ ही घरेलू उद्योगों के सामने प्रतिस्पर्धा की चुनौती भी बढ़ेगी, जिसके लिए भारत को अपनी औद्योगिक नीतियों को और अधिक सुदृढ़ बनाना होगा।यह समझौता केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीतिक संतुलन को भी प्रभावित करने की क्षमता रखता है। भारत और यूरोपीय संघ की साझेदारी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करने में सहायक सिद्ध हो सकती है। यह समझौता नियम-आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था को प्रोत्साहित करेगा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नई दिशा देगा।अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह समझौता दोनों पक्षों के लिए दीर्घकालिक आर्थिक विकास, स्थिरता और पारस्परिक सहयोग के नए अवसर प्रदान करेगा। भारत और यूरोपीय संघ के बीच यह साझेदारी भविष्य में वैश्विक आर्थिक नेतृत्व के नए आयाम स्थापित कर सकती है और एक संतुलित तथा स्थायी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
लेखक परिचय :#डॉ. रुणा आनंद राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर बी.डी. कॉलेज, पटना में कार्यरत हैं, जो पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना से संबद्ध है। आप अंतरराष्ट्रीय संबंध, वैश्विक राजनीति, आर्थिक कूटनीति तथा समकालीन राजनीतिक विषयों पर शोध एवं लेखन में विशेष रुचि रखती हैं। आपसे संपर्क ईमेल के माध्यम से किया जा सकता है – runajnu@gmail.com



