प्रियांशु कुमार समस्तीपुर बिहार/Etv News 24
समस्तीपुर विकास का ढिंढोरा पीटने वाली 20 वर्षों की नीतीश सरकार ने नये कल-कारखाने लगाना तो दूर एक समय हजारों परिवारों के चूल्हे का सहारा बना अंग्रेज जमाने 1920 का स्थापित बंद पड़े समस्तीपुर चीनी एवं पेपर मिल की सुधी तक नहीं ली जबकि चुनाव घोषणा में बंद पड़े मिलों को चालू करने का घोषणा जोर-शोर से किया जाता रहा है।उक्त बातें चीनी मिल चौक एवं आसपास के क्षेत्रों में महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में चलाये जा रहे जनसंपर्क अभियान के दौरान मतदाताओं को संबोधित करते हुए भाकपा माले जिला स्थाई समिति सदस्य सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा।उन्होंने कहा कि जब हमारी जनसंख्या कम थी, उस समय चीनी मिल, पेपर मिल समेत अन्य कल-कारखाने जिले के हजारों परिवारों को रोजगार का साधन था। लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध था लेकिन सरकार की दूरदर्शी नीति के अभाव में कल-कारखाने के बंद होने से यहां से मजदूर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हैदराबाद की ओर रूख करने लगे।20 वर्षों की नीतीश सरकार ने चुनाव पूर्व घोषणा की थी कि सभी बंद पड़े कल-कारखाने को चालू किये जाएंगे, उद्योग-धंधे लगाकर स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराये जाएंगे लेकिन 20 वर्षों की एकछत्र नीतीश सरकार ने समस्तीपुर के बंद पड़े चीनी मिल, पेपर मिल की सुधी तक नहीं ली। नये उद्योग-धंधे नहीं लगाया गया परिणामस्वरूप मिथिलांचल का प्रवेश द्वार समस्तीपुर मजदूर सप्लाई जोन बनकर रह गया। हां चुनाव आते ही दलिए नेताओं द्वारा बंद पड़े चीनी मिल एवं पेपर मिल को चालू करने का मुद्दा जरूर छेड़ दिया जाता है लेकिन सरकार बनते ही इस दिशा में पहल करना तो दूर चर्चा तक करना मुनासिब नहीं समझती है।उन्होंने चीनी मिल एवं पेपर मिल के जमीन पर कब्जा जमाने पर अफसोस जाहीर करते हुए कहा कि अगर चीनी मिल, पेपर मिल चालू नहीं हो सकता है तो उसके जगह पर कोई दूसरा उद्योग-धंधे लगे या फिर इसका व्यवसायिक इस्तेमाल कर पलायन कर रहे युवाओं के लिए रोजगार मुहैया कराने की दिशा में सरकार को कदम उठाना चाहिए।



