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पेट की आग बुझाने को मजबूर हैं खानाबदोश समुदाय

अरवल से निशान्त मिश्रा की रिपोर्ट

अरवल/बिहार
भले ही राज्य व केंद्र की सरकार  अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति से लेकर विभिन्न प्रकार के समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े समुदायों के लिए एक से बढ़कर एक योजनाओं का कार्यान्वयन कर रही है परंतु हकीकत यह है कि आज भी विभिन्न प्रदेशों में रहने वाले खानाबदोश समुदाय के लोग 2 जून की रोटी की जुगाड़ में दर-दर की ठोकरें खाते फिर रहे हैं जिसका ताजा उदाहरण इन दिनों अरवल जिले के कुर्था में स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है जहां दर्जनों की संख्या में खानाबदोश महिलाओं व पुरुष कुर्था गया मुख्य मार्ग पर सड़क के किनारे लोहे से बने हजारों को निर्मित कर ग्राहकों से बेचते देखे जा रहे हैं वहीं खानाबदोश समुदायों के सात पल रहे बच्चे भी अपने माता-पिता के काम में हाथ बढ़ाते देखे जा रहे हैं बताते चलें नक्सली आंदोलन के लिए चर्चित इस क्षेत्र में जहां दूसरे प्रदेशों के लोग मेहनत कर दू जून की रोटी की तलाश रहे हैं परंतु विडंबना इस बात की है कि स्वतंत्र भारत में रहकर भी इनकी जिंदगी खानाबदोश की तरह सड़कों पर पूजा उनके सारे काटकर आपको देखकर ऐसा महसूस होता है कि सरकार के मिलने वाले योजना से उपेक्षित नजर नजर आते हैं परंतु हकीकत जो भी हो इनके दिल और जेहन में मेहनत की भावना साफ झलकती इसलिए अपने पूरे परिवार सहित लगभग चार दिनों से कुर्था गया मुख्य मार्ग पर अपना डेरा जमाए अपने मेहनत के बदौलत स्वनिर्मित लौह वस्तु को बेचकर वह मुनाफे से अपना जीवन बसर कर रहे हैं

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